हाथ पर हाथ धरे,
बस बैठे थे हम..
यही सोच रहे थे
भ्रष्टाचार रहित भारत
कैसा होगा
भ्रष्टाचार रहित भारत
क्या कभी होगा?
अन्ना ने है वह राग छेड़ दिया ,
अन्ना ने है छुई वह, दुखती रग..
न जाने कब से घायल थी ,
न जाने कितना दर्द था उसमें ..
उमड़ पड़ा जो सारा भारत
क्या एक अन्ना का ही स्वप्न है,
बस इसमें ?
मैं भी अन्ना,
तू भी अन्ना,
बस क्या अन्ना के लिए
आज सड़क पर हो तुम ?
आँखें खोलो,
सच को देखो ..
तुम नहीं हो साथ खड़े
अन्ना के !
हाथ पर हाथ धरे,
बस बैठे थे हम..
यह अन्ना है
जो जान दे रहा है
स्वप्न तुम्हारे
पूरे करने को .
तुम तो कब से सोच रहे थे,
यही तुम सोच रहे थे,
भ्रष्टाचार रहित भारत
कैसा होगा
भ्रष्टाचार रहित भारत
क्या कभी होगा?
अन्ना ही है ,
जो बोल रहा है,
स्वप्न भी कभी
हकीकत हो सकते हैं .
तुम नहीं खड़े, अन्ना के लिए
यह अन्ना है ..
जो तुम्हारे लिए खड़ा है .
यह अन्ना है ..
जो जान दे रहा है
स्वप्न तुम्हारा
पूरा करने को
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very nice and inspiring.want to read more lines in this...PART II..
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